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आओ सखी पाती सुनो
आओ सखी पाती सुनो, यह जो लिखी बृजराज योग करो भूषण तजो, लिखत न आई लाज आँख डली झीनी पड़ीं, पंथ निहार निहार जीभडले छाले पड़े कृष्ण पुकार पुकार।
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मारग प्रेम कौ को समुझै
मारग प्रेम कौ को समुझै, ‘हरिचंद’ यथारथ होत यथा है, लाभ कछु न पुकारन में, बदनाम ही होन की सारी कथा है | जानत है जिय मेरौ भलौ, बिधि और उपाय सबै विरथा है, बाबरे हैं ब्रज के सगरे, मोहि नाहक पूछत कौन विथा है ||
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क्षण भंगुर जीवन की कलिका
क्षण भंगुर जीवन की कलिका, कल प्रात को जाने खिली न खिली । मलयाचल की शुचि शीतल मंद, सुगंध समीर मिली न मिली ॥ कलि काल कुठार लिये फिरता, तन नम्र है चोट झिली न झिली। भज ले हरिनाम अरी रसने, फिर अंत समय पे हिली न हिली ॥
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छोटे से आप विशाल सी मूरत
छोटे से आप, विशाल सी मूरत, यह सुख कौन के ठाड़े री माई। मोरपखा को मुकट बिराजत, इन्द्र छटा छाई बून्द न आई॥ चातुर के अति चातुर हैं, या बिन रीति के वेणु बजाई। मानुष तन की कौन कहे, याने चार घड़ी जमुना बिलमाई॥
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काहे को वैद बुलावत हो
काहे को वैद बुलावत हो, मोहि रोग लगाय के नारी गहो रे। वा मधुआ मधुरी मुसकान, निहारे बिना, कहो कैसे जियें रे॥ चन्दन लाय कर्पूर मिलाय, गुलाब छिपाय दुराय धरो रे। और इलाज कछू न बनै, ब्रजराज मिलैं सो इलाज करो रे ॥
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पहने यह कुंडल यूँ ही रहो
पहने यह कुंडल यूँ ही रहो, अलकावली यूँ ही सँवारे रहो। अधरामृतपान कराते हुए मुरली कर कंज में धारे रहो। नहीं और विशेष करो कुछ तो, अनियारे दृगों से निहारे रहो। कहीं जाओ न मोहन छोड़ हमें, बन जीवनप्राण हमारे रहो।

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