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छोटे से आप विशाल सी मूरत
छोटे से आप, विशाल सी मूरत, यह सुख कौन के ठाड़े री माई। मोरपखा को मुकट बिराजत, इन्द्र छटा छाई बून्द न आई॥ चातुर के अति चातुर हैं, या बिन रीति के वेणु बजाई। मानुष तन की कौन कहे, याने चार घड़ी जमुना बिलमाई॥
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काहे को वैद बुलावत हो
काहे को वैद बुलावत हो, मोहि रोग लगाय के नारी गहो रे। वा मधुआ मधुरी मुसकान, निहारे बिना, कहो कैसे जियें रे॥ चन्दन लाय कर्पूर मिलाय, गुलाब छिपाय दुराय धरो रे। और इलाज कछू न बनै, ब्रजराज मिलैं सो इलाज करो रे ॥
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पहने यह कुंडल यूँ ही रहो
पहने यह कुंडल यूँ ही रहो, अलकावली यूँ ही सँवारे रहो। अधरामृतपान कराते हुए मुरली कर कंज में धारे रहो। नहीं और विशेष करो कुछ तो, अनियारे दृगों से निहारे रहो। कहीं जाओ न मोहन छोड़ हमें, बन जीवनप्राण हमारे रहो।

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