पहने यह कुंडल यूँ ही रहो, अलकावली यूँ ही सँवारे रहो।

अर्थात हे कृष्ण आपने ये जो कुंडल पहन रखे हैं, इन्हें ऐसे ही पहने रहिए। और जिस प्रकार आपकी लटें, आपके गालों पर आ रही हैं, उन्हें (अलकावली = बाल) ऐसे ही सँवारे रखिये।

अधरामृतपान कराते हुए, मुरली कर कंज में धारे रहो।

अपने मधुर सुधा से भरे होठों का पान हमें कराते हुए, ये जो मुरली है इसे कुछ देर अपने कमल सदृश कोमल हाथों में धारे रहिए।

नहीं और विशेष करो कुछ तो, अनियारे दृगों से निहारे रहो।

और अगर ये भी न आप कीजिये, तो बस अपने निर्निमेष (अनियारे = बिना पलक झपकाए, अपलक) नेत्रों (दृग) से हमें निहारते रहिए।

कहीं जाओ न मोहन छोड़ हमें, बन जीवनप्राण हमारे रहो।

और हे मोहन! तुम हमें छोड़ कर कभी भी मत जाना। हमेशा हमारे जीवनप्राण बनकर ही रहना क्योंकि जिस प्रकार प्राण जाने पर देह का कोई अस्तित्व नहीं, वैसे ही हम भी चाहती हैं कि आपके जाते ही हमारा भी अस्तित्व समाप्त हो जाये।

Shree Radha Krishna

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