छोटे से आप, विशाल सी मूरत, यह सुख कौन के ठाड़े री माई।
आप स्वयं तो छोटे से नन्हें से बालक हैं पर आपकी मूरत, आपकी कीर्ति अति ही विशाल है अर्थात सब आपको याद रखते हैं। ऐसा अद्भुत सुख हे माँ! किसके भाग्य में (ठाढ़े = खड़े रहना, स्थित रहना, होना) होता है।
मोरपखा को मुकट बिराजत, इन्द्र छटा छाई बून्द न आई॥
मोर के पंखों का मुकुट आप पहनते हैं और आपका मेघ जैसा सुंदर नील वर्ण है, जिसे देखकर ऐसा लगता है कि इंद्र की छटा (घने बादल) छा गए हों और आपके सिर पर मयूर स्वयं पंख फैला कर उस नील वर्ण का स्वागत कर रहे हों, किंतु ये तो ऐसी इंद्र छटा (बादल) हैं जो एकदम बरसाती बादलों के नीले रंग के होने और सिर पर मयूर मुकुट के नृत्य करने पर भी एक भी बून्द नहीं बरसाते। अर्थात कितना ही उस रूप माधुरी का दर्शन कर लो, वो नैनों की प्यास बुझती ही नहीं। जैसे बस घने काले बादल छाए हों, मोर नृत्य कर रहे हों किंतु बारिश हो ही नहीं।
चातुर के अति चातुर हैं, या बिन रीति के वेणु बजाई।
और ये जो श्याम सुंदर है ये इतना लुभावना और चतुर है, इसका मनमोहक रूप जिसे देखकर हम ब्रजबालाओं का हृदय तो वैसे ही डोल जाता है, उन्होंने और चतुराई (बुद्धिमत्त्ता/चालाकी) दिखाई कि बिना किसी कारण के, बिना किसी संगीत के सुअवसर के, बिना किसी रीत (संगीत बजाने का रिवाज) के अपनी बाँसुरी (वेणु) की तान छेड़ दी।
मानुष तन की कौन कहे, याने चार घड़ी जमुना बिलमाई॥
और हाय एक बार जिसने श्यामसुंदर को देख लिया, वो तो अपने होश खो ही देता है, पर जो अभी उनसे दूर है, वहाँ ये बैरन बाँसुरी काम करती है। इस बाँसुरी का जादू कुछ ऐसा है कि मनुष्य देह (तन) की तो बात ही क्या है, इस बाँसुरी की तान सुनकर 4 घड़ी (24 मिनट की एक घड़ी होती है, सो 96 मिनट या डेढ़ घंटा) के लिए तो यमुना जल भी रुक (बिलमाई = रुक जाना) गया था।
छोटे से आप, विशाल सी मूरत, यह सुख कौन के ठाड़े री माई।
मोरपखा को मुकट बिराजत, इन्द्र छटा छाई बून्द न आई॥
चातुर के अति चातुर हैं, या बिन रीति के वेणु बजाई।
मानुष तन की कौन कहे, याने चार घड़ी जमुना बिलमाई॥





प्रतिक्रियाएँ