नाथूराम शास्त्री ‘नम्र बरेली’ जी इस रचना में मनुष्य के पल में समाप्त होने वाले, अगले दिन का भी भरोसा न होने वाले और सांसारिक भोगों की प्राप्ति की अतृप्त इच्छा रखने वाले इस देह की सच्ची तस्वीर दिखलाते हैं और कहते हैं कि –

क्षण भंगुर जीवन की कलिका, कल प्रात को जाने खिली न खिली।

मनुष्य का जीवन तो पल में बिखर जाने वाली उस कली के समान है जिसका कोई भरोसा नहीं है कि कल प्रातःकाल वो फूल की तरह खिलेगी या मुरझा जायेगी।

मलयाचल की शुचि शीतल मंद, सुगंध समीर मिली न मिली॥

पूरे जीवन वो शान्ति की तलाश सांसारिक सुखों में बिल्कुल वैसे ही करता है, जैसे कोई थका हुआ व्यक्ति ताप और थकान मिटाने वाली मलय पर्वत (मलयाचल, जहाँ चन्दन के वृक्षों से टकराकर आने के कारण पवन शीतलता और सुगन्ध लिए होती है) से आने वाली शुद्ध (शुचि), शीतल, मंद (जो शरीर को अच्छी लगे, चुभे नहीं), सुगन्धित पवन के चलने की प्रतीक्षा कर रहा हो| किन्तु जिस प्रकार उस पवन का भरोसा नहीं कि थकान मिटाने के लिए वो मिलेगी भी या नहीं और जिस प्रकार सुगन्धित-मन्द पवन के चलने पर कुछ समय के लिए अच्छा तो लगता है, पर वास्तविक थकान उस पवन से नहीं मिटती| ठीक उसी प्रकार हमें भी अल्पकाल के लिए मिले सांसारिक सुखों से लगता है कि शान्ति की प्राप्ति होगी, किन्तु ऐसा होता भी अल्पकालिक ही है।

कलि काल कुठार लिये फिरता, तन नम्र है चोट झिली न झिली।

और इन्हीं कुछ पा लेने की अभिलाषा और उसके लिए निरन्तर इस देह के ईंधन को जलाकर किये गए श्रम के बीच कलिकाल अर्थात कलियुग का समय, जिसमें पाप अधिक हैं, जीवन सहज नहीं है, संघर्ष है, दुःख है, पीड़ा है, वो कलिकाल कुल्हाड़ी (कुठार) लिए हमें चोट पहुँचाने के लिए घूम रहा है और हमारा तन अर्थात जीवन की सहनशक्ति, वो बहुत ज्यादा नहीं है, तो पता नहीं उस कलिकाल के दिए हुए घाव को यह जीवन सह (झिली अर्थात झेलना/सहना) पायेगा या नहीं या कहीं दुःख और अवसाद से प्राण ही चले जायेंगें जाएँ।

भज ले हरिनाम अरी रसने, फिर अंत समय पे हिली न हिली॥

इसीलिए इन दुःखों से छुटकारे के लिए, कलिकाल के भय से मुक्त होने के लिए, परम शान्ति की प्राप्ति के लिए, हे मेरी रसने (रसना = जीभ) ! तू आज और अभी से ही हरिनाम का उच्चारण करना शुरू कर दे क्यूंकि पता नहीं मृत्यु के समय तुझमें इतना बल बचेगा भी या नहीं कि तू हरि बोलने भर को हिल पाए।

Dying Old Man

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