भक्तिकाल में जयपुर/वृंदावन के प्रसिद्ध श्रीमद् गोविंददेव जी के विग्रह (मूर्ति) के प्राकट्य की कथा अत्यंत अलौकिक और श्रद्धा से भरी है। यह मुख्य रूप से गौड़ीय वैष्णव संप्रदाय के आचार्य श्रीमद् रूप गोस्वामी जी से जुड़ी हुई है।

इस अलौकिक प्राकट्य की कथा इस प्रकार है:

गौड़ीय वैष्णव संप्रदाय के आचार्य श्रीमद् रूप गोस्वामी जी ने ब्रजभूमि के दिव्यातिदिव्य रहस्य श्री गोविन्द देव जी को प्रकट किया; ब्रजभूमि की विलुप्त लीला स्थलियों को प्रकाशित किया; ज्ञान, वैराग्य और विशुद्ध भक्ति के द्वारा उद्धार करने वाले दिव्य ग्रंथों की रचना करी और शास्त्रोन्मोदित पद्धति से विग्रह अर्चन कर श्री राधा गोविन्द की असीम कृपा समस्त ब्रज भूमि पर करवाई।

कलिकाल के प्रभाव से इस देववासिनी तपोभूमि भारतवर्ष पर अनेकों प्रहार हुए, विधर्मियों ने समय-समय पर समस्त तीर्थों को नष्ट-भ्रष्ट किया। और इसी काल के कुचक्र से ब्रजमण्डल के तीर्थ और श्री कृष्ण की लीला स्थलियाँ भी लुप्त हो गईं। सब ओर जंगल उग आये। पुराने जानकार वृद्ध कालकवलित हो गए। ऐसे विपरीत समय में धर्म और भक्ति के प्रभाव और प्रकाश को बढ़ाने के लिए स्वयं कृष्णरूप श्री चैतन्य महाप्रभु ने त्रिवेणी के तट पर (प्रयागराज) 16 वीं शताब्दी में रूप गोस्वामी जी को वृन्दावन जाकर वहीं भक्ति साधना करते हुए वृन्दावन की लीला स्थलियों को प्रगट करने का कार्य सौंपा। विशेष रूप से योगपीठ के श्री विग्रह गोविन्द देव जी का पता लगाने का कार्य।

अब ये कार्य इतना विशेष क्यों था और योगपीठ क्या होता है, एक बार वो समझते हैं – योगपीठ वो दिव्य लीला छवि है, जिसमें श्री कृष्ण भगवान और उनकी ही प्राणप्रिया भक्ति स्वरूपा श्री राधा जी सरकार समस्त सखियों और मंजरियों के यूथों के साथ मध्य भाग में उनके वामांग में विराजित हैं। ये वो छवि है जिसमें मानो इस ब्रह्माण्ड का ही साक्षात् स्वरुप चित्रित होता है। जिस प्रकार इस ब्रह्माण्ड में प्रत्येक प्राणी का कर्म नीयत है, वो एक स्थान पर विराजमान है, ग्रहों-नक्षत्रों की नीयत गति है, सूर्य स्वरूपा प्राण शक्ति परमब्रह्म का ही प्रकाशित स्वरुप है, ठीक वैसे ही योगपीठ साधना और शक्ति का वो केंद्र है, जिसे अपने-अपने कार्यों के अनुसार समस्त सखियों ने अपने दिशानिर्देशन में नियुक्त मंजरियों (किंकरियों) के साथ चारों ओर से घेर रखा है। मंजरियाँ भी अकेली नहीं हैं। श्री राधा-गोविन्द सरकार की निरन्तर अचूक सेवा करने के लिए उन सबके नीचे पूरे-पूरे बड़े समूह (जो उनके भक्तों के हैं), सौंपी गई सेवा के किसी न किसी विशेष भाग को पूरी कार्यकुशलता से पूरा करने में लगे हैं। श्रीमद् रूप गोस्वामी जी स्वयं रूप मंजरी हैं, जो श्री ललिता सखि के समूह में हैं। इनकी श्री राधा-गोविन्द सरकार को पान का बीड़ा खिलाने की सेवा है। योगपीठ में श्री कृष्ण जी के सिंहासन के अति निकट उत्तर दिशा में इनकी नित्य स्थिति है (इसीलिए श्री गोविंददेव जी के मंदिर में जो ललिता सखि का विग्रह विराजमान है, उसे कुछ लोग रूप गोस्वामी जी का रूप मंजरी स्वरूप भी मानते हैं) ऊपर से सोचने पर सब बहुत आसान और सीधा लगता है, किन्तु सब कुछ गूढ़ार्थ से भरा है।

सो ये योगपीठ का श्री विग्रह कोई सामान्य विग्रह नहीं अपितु समस्त कृष्ण साधनाओं का केन्द्र, विशुद्ध भक्ति का दाता, इस संसार के कुचक्रों से दूर ले जाने वाला और स्वयं का बोध कराने वाला श्री विग्रह है। ये श्री विग्रह ही योगपीठ है। अर्थात इसमें स्वयं में प्राण स्वरूपा राधा रानी सरकार, समस्त सखियों और मंजरियों सहित समाहित हैं। इनका पूजन-अर्चन श्री कृष्ण का उनके समस्त भक्तवृन्दों के साथ पूजन-अर्चन है। इसीलिए इस श्री विग्रह को देखकर उन समस्त भक्तों की भक्ति की अपार शान्ति की प्राप्ति हमें भी होती है।

आज हम सभी एक ही प्रश्न का उत्तर ढूंढ़ते हैं कि मेरा इस संसार में जन्म किस उद्देश्य के लिए हुआ है? किस कार्य को करने के लिए मैं यहाँ हूँ? और इन्हीं प्रश्नों का उत्तर है ये श्री गोविन्ददेव जी का श्री विग्रह। तो इसे खोजना, इसके दर्शन करना अर्थात स्वयं को पा लेना।

श्री महाप्रभु जी ने इन्हें बस इतना कहा कि वो योगपीठ (गोविन्द का श्री विग्रह) यज्ञशाला में विराजमान कराई गई थी, आपको उसे ढूँढना है। श्री रूप गोस्वामी जी के वृन्दावन आगमन के कुछ समय पश्चात् इनके भाई श्री सनातन गोस्वामी जी भी महाप्रभु जी की आज्ञा से वृन्दावन आ गए और दौनों ने मिलकर ब्रजमण्डल की अनेक लीला स्थलियों को प्रकाशित किया। किन्तु कहीं से भी योगपीठ की कोई सूचना नहीं आ रही थी। सम्पूर्ण ब्रजमण्डल में यज्ञशाला या योगपीठ कहाँ है, ये किसी को भी नहीं पता था।

श्री रूप गोस्वामी जी को लगा कि उनके गुरु का कार्य अधूरा ही रह जायेगा। वे इस वेदना से व्याकुल हो उठे। अन्न-जल का त्याग कर दिया। महीनों एक स्थान से दूसरे स्थान तक भ्रमण करते हुए ढूंढ़ते रहे। शरीर सूख गया, पर इन्हें देह का मानो भान ही नहीं था। एक दिन दोपहर में एक वृक्ष के नीचे बैठे तो मूर्छा सी आ गई। उसी अवस्था में एक बालक ये कहते हुए दिखा कि मैं यहीं पास के गोमा टीले में हूँ, मुझे निकालो। ये उसी क्षण जाग्रत अवस्था में आ गए और किसी बालक को समीप न देखकर और भी व्याकुल हो उठे। इतने में एक बालक छाछ की मटकी लेकर इनके पास आया और इनसे विनती करने लगा कि बाबा तुम तनिक छाछ पी लो, बड़ा काम करना है तो शक्ति भी तो चाहिए। इनके कुछ समझ में नहीं आया तो पूछे कि बालक कौनसा काम करना है। तो बालक ने कहा कि यज्ञशाला ढूँढ रहे हो ना बाबा। श्री रूप गोस्वामी जी की आँखों में चमक आ गई। पूछे कि तुम इस बारे में कैसे जानते हो। तो बालक विनोद करने लगा कि बाबा मैं क्या सारा ब्रज जानता है ये तो। तो गोस्वामी जी ने कहा कि क्या तुम्हें पता है कि वो कहाँ है। तो बालक ने पास के एक टीले की ओर ऊँगली दिखाकर कहा, उस गोमा टीले में है बाबा। श्री रूप गोस्वामी जी मानो आश्चर्य से अवाक रह गए। उस टीले की ओर देखते रहे। बालक ने कहा, वहाँ नित्य प्रातःकाल में एक गाय आकर एक पेड़ के नीचे खड़ी होती है और उसके थनों से अपने आप दूध की धार गिरने लगती है। वहीं खोदना तो जो ढूंढ रहे हो वो मिल जायेगा। अभी गोस्वामी जी के कुछ समझ में भी नहीं आ पाया था और पूछना चाह रहे थे कि तुम्हें ये सब कैसे पता कि इतने में तो वो बालक गायब हो गया। श्री रूप गोस्वामी जी के समझ में ही नहीं आ पा रहा था कि वे जाग्रत अवस्था में हैं या अभी भी मूर्छा में स्वप्न देख रहे हैं। पर छाछ की मटकी देखकर उन्हें यह विश्वास हो गया कि यह बालक और स्वप्न में दिखा बालक तो एक ही हैं। और वो बालक और कोई नहीं साक्षात् गोविन्द ही हैं। रूप गोस्वामी जी इस दिव्य दर्शन की अनुभूति से भाव विभोर हो उठे। आँखों से अश्रुधारा बह उठी। पास के गाँव वालों को उन्होंने एकत्र किया और इस वृत्तान्त को सुनाकर यह निवेदन किया कि वे सभी इस कार्य में उनकी सहायता करें। सभी सहर्ष तैयार हो गए।

अगले दिन सुबह जब गाय आई और एक वृक्ष के नीचे दूध की धार गिराकर संकेत दे गई, तो श्री रूप गोस्वामी जी ने उन ग्रामीणों के साथ मिलकर हाथों से ही टीले को धीरे-धीरे खोदना शुरू किया कि कहीं विग्रह को कोई क्षति न पहुँचे। कुछ गहराई तक खोदने पर उन्हें दो शिलाओं के मध्य में विराजमान श्री गोविन्द के अद्भुत नीलवर्णी, त्रिभंगी, तिरछी मनोहर विशाल दृष्टि से देखते योगपीठ के स्वरूप का दर्शन हुआ। सभी के हर्ष का ठिकाना न रहा। सभी गाँव वाले जोर-जोर से जयकारा लगाते, कीर्तन करते हुए बहुत सावधानी के साथ श्री विग्रह को निकालने लगे। श्री विग्रह के बाहर आते ही मानो समस्त ब्रजमण्डल में भक्ति की लहर सी दौड़ गई।

विक्रम संवत् 1590/सन 1525 के आसपास में श्री रूप गोस्वामी जी ने विधिवत एक कुटिया बनाकर उसमें बसन्त पञ्चमी के दिन प्रथम बार यमुना जल से अभिषेक किया, तब से इसी दिन श्री गोविंददेव जी का प्राकट्य उत्सव के रूप में मनाया जाता है।

धीरे-धीरे सब ओर समाचार पहुँचा, आसपास के क्षेत्रों के ठाकुर, राजा, जागीरदार, व्यापारी आदि उस दिव्य स्वरूप के दर्शन और रसभरी कथा के श्रवण के लिए आने लगे। अनेकों रूप गोस्वामी जी के शिष्य हो लिए। नित्य उत्सव, भण्डारे और कीर्तन होने लगे। मानो साक्षात् भक्ति मैया का पुनर्जन्म हो गया हो। जयपुर के तात्कालिक महाराजा श्री सवाई मानसिंह जी प्रथम ने श्री रघुनाथ भट्ट गोस्वामी जी के आदेशानुसार इस विग्रह के लिए वृंदावन में गोमा टीले पर ही एक भव्य और विशाल लाल बलुआ पत्थर के सप्तमंजिला मंदिर का निर्माण करवाया था। जो आज भी वहीं है।

कालान्तर में औरंगजेब के आक्रमण के समय इस मन्दिर की तीन मन्जिलें ध्वस्त कर दी गईं किन्तु तभी जयपुर महाराजा सवाई जयसिंह जी ने, गुप्त सूचना विभाग द्वारा आक्रमण की पूर्व सूचना प्राप्त कर, इस दिव्य विग्रह को सुरक्षित वृंदावन से जयपुर लाने की व्यवस्था करा दी। पहले आमेर में विराजित करने के बाद, जब जयपुर शहर बसाया गया और महाराजा ने यहाँ महल बनवाया, तो गोविंददेव जी को जयपुर के वास्तविक राजा मानते हुए उन्हें यहाँ सूर्य महल में विराजित किया। आज भी गोविंददेव जी जयपुर के राजा के रूप में यहीं विराजमान हैं और लाखों भक्तों की आस्था का केंद्र हैं।

Govind Dev Ji Ka Prakatya

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