शब्दों के प्रयोग और विन्यास की दृष्टि से हरिचंद जी का यह सवैया हिन्दी काव्य कला का एक अच्छा उदहारण है। हरिचंद जी इसमें कहते हैं कि –
मारग प्रेम कौ को समुझै, ‘हरिचंद’ यथारथ होत यथा है
ब्रज की गोपी अपनी व्यथा (परेशानी) की कथा कह रही है कि किसी से प्रेम हो जाने पर सब स्थानों पर वही दिखलाई पड़ता है सो ऐसे प्रेम के मार्ग (रास्ते) को (कौ) प्रेमी के अलावा कौन (को) समझ सकता है, इस रास्ते में तो कृष्ण (प्रेम) सब स्थानों पर वास्तविकता (यथारथ) जैसा (यथा) ही दीख पड़ता है, अर्थात प्रत्यक्ष में न होते हुए भी ऐसा लगता है कि अभी यहीं तो था।
लाभ कछु न पुकारन में, बदनाम ही होन की सारी कथा है।
और उसके एक झलक में दिखलाई पड़ गायब हो जाने पर मन करता है कि उसे पुकारूँ। लेकिन पुकारने से आएगा तब ना, जब वहाँ होगा। सो पुकारने में लाभ तो कुछ भी नहीं है, बल्कि इससे तो बदनामी ही होगी। इसलिए ये कृष्ण प्रेम का मार्ग तो बदनाम ही करता है।
जानत है जिय मेरौ भलौ, बिधि और उपाय सबै विरथा है,
और मेरा मन जानता है कि कोई भी तरीका (बिधि) या उपाय यहाँ काम नहीं करता। वो तो सब बेकार (विरथा) हैं। ये तो विरह की एक ऐसी पीड़ा है, जिसमें बस जलना ही है।
बाबरे हैं ब्रज के सगरे, मोहि नाहक पूछत कौन विथा है॥
और ब्रज के सारे लोग (सगरे) बावरे (बाबरे) हो गए हैं जो मुझसे बेकार (व्यर्थ / नाहक) में ही पूछते रहते हैं की तुम्हें क्या दुःख या परेशानी (विथा) है। अर्थात अब मई उन्हें अपनी परेशानी क्या ही बताऊँ क्यूँकि सच में तो कुछ है ही नहीं। ये तो मेरे मन का मेरे मन में ही चलने वाला विरह और प्रेम का बुना हुआ भ्रमजाल है।
- मारग = मार्ग
- कौ = का
- को = कौन
- यथारथ = यथार्थ = सच/वास्तविकता
- यथा = जैसा
- बिधि = विधि = तरीका
- विरथा = वृथा = व्यर्थ
- बाबरे = बावरे
- सगरे = सभी
- नाहक = व्यर्थ
- विथा = व्यथा = परेशानी
मारग प्रेम कौ को समुझै, 'हरिचंद' यथारथ होत यथा है,
लाभ कछु न पुकारन में, बदनाम ही होन की सारी कथा है।
जानत है जिय मेरौ भलौ, बिधि और उपाय सबै विरथा है,
बाबरे हैं ब्रज के सगरे, मोहि नाहक पूछत कौन विथा है॥




प्रतिक्रियाएँ