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क्षण भंगुर जीवन की कलिका
क्षण भंगुर जीवन की कलिका, कल प्रात को जाने खिली न खिली । मलयाचल की शुचि शीतल मंद, सुगंध समीर मिली न मिली ॥ कलि काल कुठार लिये फिरता, तन नम्र है चोट झिली न झिली। भज ले हरिनाम अरी रसने, फिर अंत समय पे हिली न हिली ॥
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क्षण भंगुर जीवन की कलिका, कल प्रात को जाने खिली न खिली । मलयाचल की शुचि शीतल मंद, सुगंध समीर मिली न मिली ॥ कलि काल कुठार लिये फिरता, तन नम्र है चोट झिली न झिली। भज ले हरिनाम अरी रसने, फिर अंत समय पे हिली न हिली ॥
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