काहे को वैद बुलावत हो, मोहि रोग लगाय के नारी गहो रे।
अब वैद्य बुलाने से क्या होगा, मुझे तो ऐसा रोग लग गया है कि नाड़ी ही चली गई है। हृदय ने मानो धड़कना ही बंद कर दिया है।
वा मधुआ मधुरी मुसकान, निहारे बिना, कहो कैसे जियें रे॥
वो गोविन्द की शहद सी मीठी (मधुआ) मुस्कान निहारे (देखे) बिना कोई जीवित भी कैसे रह सकता है।
चन्दन लाय कर्पूर मिलाय, गुलाब छिपाय दुराय धरो रे।
वो चंदन जो कर्पूर मिला हुआ होता है, वो गुलाब की पंखुरियाँ, सब मुझे उस श्यामसुंदर की याद दिलाती हैं, जिससे मन विरह में और जलने लगता है, इसलिए इन सब को छिपा कर मुझ से दूर कर दो।
और इलाज कछू न बनै, ब्रजराज मिलैं सो इलाज करो रे ॥
और ये तो रोग ही कुछ ऐसा है कि इसमें और कोई उपाय तो बनता नहीं, अब तो बस ऐसा उपाय करो कि मुझे ब्रजराज कृष्ण के दर्शन हो जायें।
काहे को वैद बुलावत हो, मोहि रोग लगाय के नारी गहो रे।
वा मधुआ मधुरी मुसकान, निहारे बिना, कहो कैसे जियें रे॥
चन्दन लाय कर्पूर मिलाय, गुलाब छिपाय दुराय धरो रे।
और इलाज कछू न बनै, ब्रजराज मिलैं सो इलाज करो रे ॥





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