ये जुड़े हुए सेवैये होते हैं, जहाँ एक अकेला अधूरा रह जाता है और पूरी बात अगले सेवैये से ही पूरी होती है। प्रसंग यह कि उद्धव जी श्री कृष्ण का संदेश (पाती) लेकर ब्रज गोपियों के पास जाते हैं। अब वहाँ वो भोली गोपियाँ पढ़ी-लिखी भी नहीं हैं, सो उद्धव जी से ही पूछती हैं कि पत्र में क्या लिखा है और जब उद्धव जी परमब्रह्म की प्राप्ति के लिए साधना का पथ उन गोपिकाओं को बताते हैं तो उन्हें बहुत बहुत दुःख व्यापता है। और वो आपस में एक दूसरे से कहती हैं कि –
आओ सखी पाती सुनो, यह जो लिखी बृजराज
आओ सखी यह जो कृष्ण ने हमारे लिए पत्र (पाती) के रूप में अपना संदेश भेजा है, उसे सुनो। और ध्यान से सुनो कि हमारा कान्हा हमारा ब्रजराज हमारे लिए स्वयं आने के स्थान पर अपने पत्र में क्या लिख रहा है…
योग करो भूषण तजो, लिखत न आई लाज।
वो लिखता है कि अब मुझे पाने के लिए सजना संवरना छोड़ कर (तजो / त्यागो) योग साधना करो। अरे उसे यह लिखते हुए जरा भी लज्जा (लाज) नहीं आई।
आँख डली झीनी पड़ीं, पंथ निहार निहार
यहाँ वो तप और योग की बात कर रहा है और हम तो वो जिस दिन से गया है तब से उसके वापिस लौट कर आने की राह देख रही हैं। पलकें झपकना भी भूल गई हैं। आँखों की नमी समाप्त हो गई जिससे आँख का तारा (आँख डली) भी झीना पड़ गया (आंखें पथरा गईं), लेकिन वो एक क्षण को भी वापिस नहीं आया।
जीभडले छाले पड़े कृष्ण पुकार पुकार॥
और जब वो गया तब से हम बावरी होकर कृष्ण कृष्ण कह रथ की दिशा में दौड़ीं, वो नहीं रुका और हमारी वाणी नहीं रुकी। हम तो तब से लगातार कृष्ण कृष्ण पुकार रही हैं। कृष्ण कृष्ण कहते कहते हमारी जीभ के ऊपर छाले भी पड़ गए। अब और कौनसा योग वो करवाना चाहता है दर्शन देने के लिए।
निरमोही नंदलाल है, मोही दशरथलाल,
अब एक सखी कहती है कि देखो वही सौंदर्य, वही रूप, लेकिन ये नंद को लाल तो इतना निर्मोही निकला कि हम ब्रजबालाओं को, जो उसकी सबसे प्रिय थीं, उन्हें स्वयं त्याग कर चला गया।
वह ढूंढत वन वन फिरे, इन त्यागी ब्रजबाल।
दूसरी ओर वो मोह में पड़े दशरथ के पुत्र श्री राम थे, जो अपनी पत्नी के गुम हो जाने पर वन-वन भटक भटक कर उन्हें ढूंढते रहे। [कहने का अर्थ यह कि वो श्री राम मर्यादा पुरुषोत्तम अवतार होने के बाद भी पत्नी के मोह में एक आम मनुष्य की भाँति व्यवहार कर उन्हें ढूंढने और वापिस लाने के प्रयास में ही लगे रहे, यही रामायण है। और इधर श्री कृष्ण प्रेम और सौंदर्य का अवतार होते हुए भी ऐसा निर्मोही स्वरूप दिखा गए कि हम सब कोमल बालाओं को इस संसार की गालियाँ सुनने के लिए स्वयं ही छोड़ कर चले गए। क्या यही उनके प्रेम के अवतार की सच्चाई थी।]
सखी कृष्ण को दोष नहीं, हम जो करी अनरीति,
हे सखी लेकिन इसमें कृष्ण का कोई दोष नहीं है क्योंकि नियम विरुद्ध तो हम ही गईं।
अपनो पतिव्रत छाड़ि के करी कृष्ण सों प्रीति॥
हम ही अपने पति-बच्चे-घर-बार त्याग कर उस कृष्ण के प्रेम में बावरी हुई फिर रही थीं। उसे तो हमसे प्रेम था ही नहीं।
- पाती = चिट्ठी/पत्र
- भूषण = आभूषण /गहने
- तजो = त्यागो
- लाज =लज्जा
- आँख डली = आँख की पुतलियाँ /तारा/नज़र
- जीभडले = जीभ के ऊपर
- अनरीति = समाज की परंपरा के विरुद्ध कार्य
आओ सखी पाती सुनो, यह जो लिखी बृजराज,
योग करो भूषण तजो, लिखत न आई लाज।
आँख डली झीनी पड़ीं, पंथ निहार निहार,
जीभडले छाले पड़े कृष्ण पुकार पुकार॥
निरमोही नंदलाल है, मोही दशरथलाल,
वह ढूंढत वन वन फिरे, इन त्यागी ब्रजबाल।
सखी कृष्ण को दोष नहीं, हम जो करी अनरीति,
अपनो पतिव्रत छाड़ि के करी कृष्ण सों प्रीति॥




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