जयपुर के प्रसिद्ध गोविंद देव जी मंदिर में स्थापित भगवान गोविंद देव जी और राधा रानी की मूर्तियाँ मूल रूप से वृंदावन की ही हैं और इनकी कथा अति ही रस भरी है। एक ओर गोविन्द देव जी की बाल मनुहार है तो दूसरी ओर मदन मोहन जी का फेरा। आखिर हमारे लाल जू स्वयं टेढ़े हैं, तो सिधाई तो उनके विग्रह में भी कहाँ से होगी। तो कथा इस प्रकार है –

श्री गोविन्द देव जी की विवाह की इच्छा

श्री गोविन्द देव जी की अर्चा-पूजा करते कुछ समय व्यतीत हुआ, उन्हीं के भाई सनातन गोस्वामी जी ने लक्ष्मण जी सेवित श्री मदनमोहन जी का दिव्य विग्रह खोज निकाला। भक्तिकाल कृष्ण-गोविन्द के जयकारों से गुँजायमान हो रहा था। कि एक दिन श्री रूप गोस्वामी जी से गोविन्द देव जी स्वप्न में बोले कि मोकू ब्याह करा दे। मोहे मोरी राधारानी लाय दे। अब गोस्वामी जी विचार में पड़ गए कि इन्हें ढूँढने में इतना समय लगा, अब इनके लिए इनकी राधा रानी को कहाँ से लाऊँ। सो यह बात बताने वो सनातन गोस्वामी जी के पास पहुँचे। तो देखते हैं, वो तो पहले ही परेशान हैं। उन्होंने भी ऐसे ही स्वप्नादेश की बात बताई। तो अभी तो केवल गोविन्द की जिद से परेशान थे, पर अब तो दौनों के लिए श्री राधारानी को लाना था।

भक्त का तो भगवान् ही सहारा। सो दौनों ने मिलकर श्री राधारानी सरकार का ध्यान किया और उनसे ही अरज लगाई कि आपके प्रियतम आपके दिव्य स्वरूप के बिना अधूरे हैं अतः शीघ्र ही कहीं से अपने दो विग्रह रूप प्रगट कीजिये। हमारी राधारानी तो हैं ही करुणा का भण्डार। सो दो-चार दिन में ही वहाँ उड़ीसा के राजा श्री पुरुषोत्तम जाना जी (राजा प्रतापरुद्र के पुत्र), गोविन्द देव जी और मदन मोहन जी के दर्शन करने पधारे। गोस्वामी जी ने गोविन्द जी और मदन मोहन जी के लिए राधारानी के विग्रह की बात उनसे भी कही। सो उन्होंने कहा कि आप बिल्कुल चिंता मत कीजिये, मैं शीघ्र ही अपने दिशा-निर्देशन में दौनों ठाकुरों की ऊँचाई ध्यान में रखते हुए दो अलग-अलग अष्ट धातु के विग्रह बनवाकर भिजवा दुँगा।

मदन मोहन जी की राधारानी और ललिता सखि

लगभग एक महीने में ही उन्होंने अष्टधातु की दो सुन्दर मूर्तियाँ बैलगाड़ी में विराजित कर भिजवा दीं। रात्रि में जब बैलगाड़ी पहुँची, तो दौनों विग्रह मदन मोहन जी के मंदिर में ही रखवा दिए कि सुबह होगी तब गोविन्द जी के लिए आया विग्रह वहाँ पहुँचवा देंगे। पर मदन मोहन जी ने रात्रि में ही पुनः सनातन जी को दर्शन दिए और बोले कि ये दौनों विग्रह तो मैं ही रखुँगा। तो गोस्वामी जी ने समझाया कि लाला राधारानी तो एक ही होती हैं, तो तुम दो विग्रह का क्या करोगे। तो ठाकुर जी बोले कि अरे उनमें से एक विग्रह तो मेरी राधा जू का ही है, पर दूसरी तो ललिता सखि की छवि है।

अब जब अगले दिन सुबह उठकर गोस्वामी जी ने दौनों विग्रहों का निरीक्षण किया, तो वास्तव में ऐसा ही पाया। यही बात उन्होंने श्री रूप गोस्वामी जी को भी कह सुनाई। और साथ ही यह भी कहा कि श्री राधारानी से विवाह और विग्रह की मदन मोहन जी के साथ स्थापना तभी करेंगे, जब गोविन्द देव जी के लिए भी राधारानी का विग्रह प्राप्त हो जायेगा। तो गोस्वामी जी ने उड़ीसा नरेश श्री पुरुषोत्तम जाना जी को पत्र में लिखकर सारा वृत्तान्त बता दिया।

उड़ीसा की लक्ष्मी जी हमारी श्री राधारानी सरकार

अब उड़ीसा नरेश सोचने लगे कि मदन मोहन जी ने दौनों विग्रह रख लिए, गोविन्द देव ठाकुर तो और भी नटखट हैं, अब कितने विग्रह बनवाकर उनके लिए भेजें कि वे मान जाएँ। नरेश के आदेश पर विग्रह निर्माण का कार्य आरम्भ भी हो गया, किन्तु जैसी प्रेरणा पिछली बार मिल रही थी, वैसी प्रेरणा मूर्तिकारों को इस बार नहीं मिल रही थी। और भगवान् का विग्रह बिना भगवत प्रेरणा के बन ही नहीं सकता, सो विलम्ब हो रहा था।

तभी एक रात श्री पुरुषोत्तम जाना जी को श्री राधारानी ने स्वप्न में दर्शन दिए और कहा कि तुम्हारे पिताजी, राजा श्री प्रतापरुद्र जी ने मेरे राधारानी स्वरूप के विग्रह की स्थापना लक्ष्मी मानकर पुरी के चक्रवेधा में की है। जबकि वो राधा जी का प्राचीन विग्रह है, जो आक्रमण के समय बृहदभानु नाम के ब्राह्मण द्वारा राज्य के राधानगर प्रान्त में ले आया गया था। अतः तुरन्त व्यवस्था की जाये और उनके प्रिय गोविन्द देव के लिए इस विग्रह को ही भेजा जाये।

उड़ीसा नरेश श्री पुरुषोत्तम जाना जी ने भी विलम्ब न करते हुए पूरी साज-सज्जा और भेंट आदि के साथ उन्हें ऐसे ही विदा किया, जैसे कोई राजा अपनी बेटी का विवाह कर रहा हो। उनके विग्रह के वृन्दावन पहुँचते ही दौनों गोस्वामियों ने शुभ मुहूर्त निकले। विधिवत सभी संस्कार पूरे किये गए और महीनेभर बधाइयाँ गाने के बाद सन 1633 (संवत 1690) में बड़े धूमधाम के साथ श्री राधारानी सरकार का विवाह श्री गोविंद देव ठाकुर जी से और दूसरे राधारानी के विग्रह का विवाह श्री मदन मोहन ठाकुर जी के साथ कराकर, सभी विग्रहों की स्थापना कर दी गई।

Radha Rani Vigrah Leela Katha

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