वैष्णव थाली के लिए एक दिन एडवांस में दोपहर 1:00 से 4:00 बजे के बीच कॉल द्वारा संपर्क करें। व्रत की थाली भी उपलब्ध है| काली मिर्ची और सेंधा नमक ही प्रयोग में लाया जाता है और दैनिक मसाले नहीं होते हैं| वैष्णव थाली और नाश्ते में प्याज - लहसुन नहीं होता और मिर्च - मसाले कम होते हैं|

पहने यह कुंडल यूँ ही रहो

गोविन्द रसश्रृंगारभाषा - बृज | प्रकार - सवैया

A serene sunrise over the Govind Darshan temple grounds, with soft golden light illuminating ancient stone walls and blooming flowers.
A serene sunrise over the Govind Darshan temple grounds, with soft golden light illuminating ancient stone walls and blooming flowers.

अर्थात हे कृष्ण आपने ये जो कुंडल पहन रखे हैं, इन्हें ऐसे ही पहने रहिए। और जिस प्रकार आपकी लटें, आपके गालों पर आ रही हैं, उन्हें (अलकावली = बाल) ऐसे ही सँवारे रखिये।

अपने मधुर सुधा से भरे होठों का पान हमें कराते हुए, ये जो मुरली है इसे कुछ देर अपने कमल सदृश कोमल हाथों में धारे रहिए।

और अगर ये भी न आप कीजिये, तो बस अपने निर्निमेष (अनियारे = बिना पलक झपकाए, अपलक) नेत्रों (दृग) से हमें निहारते रहिए।

और हे मोहन! तुम हमें छोड़ कर कभी भी मत जाना। हमेशा हमारे जीवनप्राण बनकर ही रहना क्योंकि जिस प्रकार प्राण जाने पर देह का कोई अस्तित्व नहीं, वैसे ही हम भी चाहती हैं कि आपके जाते ही हमारा भी अस्तित्व समाप्त हो जाये।

पहने यह कुंडल यूँ ही रहो,
अलकावली यूँ ही सँवारे रहो।
अधरामृतपान कराते हुए
मुरली कर कंज में धारे रहो।
नहीं और विशेष करो कुछ तो,
अनियारे दृगों से निहारे रहो।
कहीं जाओ न मोहन छोड़ हमें,
बन जीवनप्राण हमारे रहो।

अपनी प्रतिक्रिया दें